कल्पना कीजिए 21-22 साल के दो लड़के, जिनकी जेब में बड़े सपने हैं मगर बैंक बैलेंस में मुश्किल से कुछ हज़ार डॉलर। न कोई भव्य ऑफिस, न कोई बड़ी टीम — बस एक छोटा सा कमरा, कुछ पुराने कंप्यूटर, और दिन-रात जलती आँखों में एक ही जुनून: इंटरनेट पर बिखरी हुई पूरी दुनिया की जानकारी को व्यवस्थित करना।
आज, 27 सितंबर को, वही सपना अपना 28वां जन्मदिन मना रहा है — और उसका नाम है Google। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं Google का नाम कैसे पड़ा — इसके पीछे की कहानी उतनी ही इंसानी, उतनी ही अनप्लांड है, जितनी खुद ज़िंदगी होती है।
दो अजनबियों की मुलाकात जिसने इतिहास बदल दिया
बात है 1995 की। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में नए पीएचडी छात्रों के लिए एक ओरिएंटेशन टूर चल रहा था। Sergey Brin, जो पहले से वहाँ पढ़ रहे थे, को ज़िम्मेदारी मिली नए छात्रों को कैंपस घुमाने की। उसी ग्रुप में एक लड़का था — Larry Page, जो अभी-अभी मिशिगन यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर आया था।
कौन जानता था कि यह एक साधारण-सा कैंपस टूर, दो अजनबियों की एक मामूली मुलाकात, आने वाले वर्षों में पूरी दुनिया के सोचने, खोजने और जानकारी हासिल करने के तरीके को हमेशा के लिए बदल देगी।
“BackRub” — वह नाम जो शर्मिंदगी बन सकता था
1996 में, Larry और Sergey ने मिलकर एक रिसर्च प्रोजेक्ट शुरू किया। उनका आइडिया था कि किसी वेबपेज की अहमियत को इस आधार पर आँका जाए कि कितनी दूसरी वेबसाइट्स उसे लिंक कर रही हैं — यानी “बैकलिंक्स”। इसी वजह से उन्होंने इस प्रोजेक्ट को नाम दिया “BackRub”।
सोचिए ज़रा — अगर आज भी यह नाम वैसा ही बना रहता, तो शायद हम कहते “ज़रा BackRub कर लो” न कि “ज़रा Google कर लो”! यह नाम स्टैनफोर्ड के सर्वर पर करीब एक साल तक चलता रहा, जब तक कि यह इतना ज़्यादा बैंडविड्थ खाने लगा कि इसे बदलना ज़रूरी हो गया।
यह भी पढ़ें:
Google का नाम कैसे पड़ा — वो रात, वो व्हाइटबोर्ड, और एक टाइपिंग की गलती
सितंबर 1997 की एक शाम। स्टैनफोर्ड के Gates Computer Science बिल्डिंग के कमरा नंबर 360 में, Larry Page अपने ऑफिसमेट्स — Sean Anderson, Tamara Munzner और Lucas Pereira — के साथ बैठा था। व्हाइटबोर्ड पर नए-नए नाम लिखे और मिटाए जा रहे थे। सबको एक ऐसा नाम चाहिए था जो उस बेइंतहा, अनगिनत डेटा के विचार को बयां कर सके, जिसे वे व्यवस्थित करना चाहते थे।
तभी Sean ने कहा — “googolplex”। Larry ने तुरंत जवाब दिया — “googol” — यह वह गणितीय शब्द है जिसका मतलब है 1 के बाद 100 शून्य लगाना (10^100), यानी एक ऐसी संख्या जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है।
Sean अपने कंप्यूटर पर बैठा था। उन्होंने तुरंत चेक किया कि क्या यह डोमेन नाम खाली है। जल्दबाज़ी में, बिना यह जाने कि “Googol” असल में कैसे स्पेल होता है, उन्होंने टाइप कर दिया — “Google”।
और यहीं वह पल आया जो इतिहास बदलने वाला था। डोमेन खाली था। जब Larry को पता चला कि Sean ने स्पेलिंग गलत टाइप की है, तो पहले उन्होंने इसकी तरफ इशारा भी किया — पर फिर कुछ पल सोचने के बाद, उन्हें यह “गलत” नाम अजीब तरह से सही लगने लगा। इसमें एक अनोखापन था, एक सरलता थी, जो असली शब्द “Googol” में नहीं थी।
15 सितंबर 1997 को, इसी छोटी सी गलती को दुनिया के सामने एक नए नाम के रूप में रजिस्टर कर दिया गया — Google.com।
ज़रा सोचिए, अगर उस रात Sean की उंगलियाँ सही स्पेलिंग टाइप कर देतीं, तो शायद आज हम “Googol” कहते, “Google” नहीं। कभी-कभी दुनिया की सबसे बड़ी चीज़ें, सबसे छोटी सी गलतियों से जन्म लेती हैं — और यही बात इस कहानी को इतना इंसानी और इतना खूबसूरत बनाती है।
एक किराए के गैराज से दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी तक
4 सितंबर 1998 को Google को आधिकारिक तौर पर एक कंपनी के रूप में स्थापित किया गया — और इसका पहला “ऑफिस” कोई शानदार बिल्डिंग नहीं थी, बल्कि एक किराए का गैराज था। यही वह जगह थी जहाँ से दुनिया की सबसे प्रभावशाली टेक कंपनियों में से एक की नींव पड़ी।
उसी साल अगस्त में, जब Larry और Sergey कुछ दिनों के लिए Burning Man फेस्टिवल गए, तो उन्होंने अपने होमपेज पर एक मज़ेदार सा “आउट ऑफ ऑफिस” संदेश छोड़ा — Google के लोगो के दूसरे “O” के पीछे एक छोटा सा स्टिक फिगर, जो उस फेस्टिवल की एक झलक थी। यही बना Google का सबसे पहला “डूडल” — एक ऐसी परंपरा जो आज भी हर खास मौके पर जारी है।
एक गलती से एक क्रिया (verb) तक का सफर
आज “Google” सिर्फ एक कंपनी का नाम नहीं रहा। यह शब्द डिक्शनरी में एक क्रिया बन चुका है — “गूगल करना”। हर दिन अरबों लोग बिना यह सोचे कि Google का नाम कैसे पड़ा, या इसके पीछे कितनी मेहनत, कितने सपने और एक साधारण-सी टाइपिंग गलती छिपी है, बस “गूगल” कर लेते हैं।
यही तो असली खूबसूरती है इस कहानी की — दो साधारण छात्र, एक बड़ा सपना, एक गलत स्पेलिंग, और एक ऐसा नाम जो आज हर घर, हर जेब, हर मन में बस चुका है।
तो अगली बार जब आप कुछ खोजने के लिए Google खोलें, एक पल रुकिए और याद कीजिए — इस नाम के पीछे छिपी है दो दोस्तों की मेहनत, एक व्हाइटबोर्ड पर हुई बहस, और एक छोटी सी गलती जिसने दुनिया बदल दी।
यह भी पढ़ें:

